Sunday, November 28, 2010

Wednesday, October 6, 2010

संकट में संगीत

बाड़मेर। भले ही 1982 में एशियाड धोधे खां के अलगोजे की धुन पर शुरू हुआ हो या खड़ताल के जरिए विदेशों में धूम मची हो। लेकिन नए कलाकार परंपरागत वाद्य यंत्रों को बजाना सीखना नहीं चाहते। इसके चलते अब अलगोजा,नड़ तथा कमायचा बजाने वाले कम शख्य ही इस वक्त जिन्दा है। इससे भी बुरी खबर यह है कि इन वाद्य यंत्रों को बनाने वाले भी कम हो गए है। ऐसे में यह कहा जाए कि आगामी वर्षों में इन वाद्ययंत्रों को बनाने वालों के साथ बजाने वालों की कमी खलेगी तो शायद कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
पश्चिमी राजस्थान के संगीत के साथ बाड़मेर एवं जैसलमेर के कलाकारों की अपनी अनूठी कहानियां रही है। पहले की बात हो या मौजूदा समय की। ये कलाकार जीवन के हर पल में शरीक होते रहे है। लेकिन समय के साथ पुराने वाद्ययंत्रों को बजाने वालों की तादाद घटती जा रही है। अलगोजा वाद के रूप में धोधे खां,कमरूद्दीन,हबीब खां के साथ कुछ अन्य लोग, नड़वादक आमद एवं शेरू तथा मोरचंग बजाने वालों में बाछड़ाऊ का मालाराम एवं जैसलमेर का अलादीन चर्चित है। जब तक ये कुछ कलाकार जिन्दा है तब तक इन वाद्ययंत्रों को बजाने की कला भी जीवित रह सेगी। जवानी में एक घंटे तक अलगोजा बजाने वाले धोधे खां की अब कुछ मिनट के बाद सांस फूल जाती है। उसे आज भी याद है जब उसकी धुन पर एशियाड शुरू हुआ था। इसे अलावा 24 नवंबर 1986 को वो दिन जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और सोनिया गांधी दौरे पर आए थे। तब उन्होंने उससे दोपहर भोज के दौरान अलगोजा सुना था। बिजड़ियार निवासी कमरूद्दीन भी अलगोजा बजाने में पारंगत है। ये दोनों पाक से अपने उस्ताद मिसी जमाली से अलगोजा सीखकर आए थे। अब इस कला को सीखने वाले नए कलाकारों की बात तो दूर रही धोधे खां खुद ही भूखमरी का सामना कर रहे है।
जानकारों के मुताबिक वाद्ययंत्रों को बजाने वालों के साथ इनको बनाने वाले भी घटे है। इतना ही नहीं मध्य एशिया में धनचक के नाम से जाना जाने वाला कमायचा रोहिड़े एवं आक की लकड़ी से बनाया जाता है। इसमें बकरे की खाल के साथ इसकी गजक मान में घोड़े के बाल लगाए जाते है। कमायचा बजाने वाले करीब डेढ़ दर्जन लोग ही रह पाए हैं। राणका फकीरों द्वारा बजाया जाने वाला अलगोजा केर एवं बांस की लकड़ी से बनता है। वहीं नड़ बनाने के लिए केर एवं कगोर की लकड़ी इस्तेमाल की जाती है। जबकि मोरचंग पीतल या लोहे का बनाया जाता है। इसे सामान्तया गायों को चराने वाले चरवाहे बजाते आए है। बहरहाल इसे बजाने वाले भी दिनोंदिन घट रहे है। बुजुर्ग कलाकारों के शब्दों में कई वाद्ययंत्र तो खत्म हो चुके है ऐसे में इनको बचाए रखने की जरूरत है। कई मर्तबा उनकी कोशिश होती है कि नई पीढ़ी इस कला को सीखे। लेकिन कोई खड़ताल के साथ इसे सीखना नहीं चाहता ऐसे में अगर कोई पहल करें तो शायद कुछ काम बन सकता है। उनको तो ये पता है कि उने साथ ही यह कला खत्म होने के साथ उने वाद्ययंत्र भी कुछ समय बाद कबाड़ का हिस्सा बन जाएंगे।

आस्था का केन्द्र वीरातरा माता का मंदिर

भारत-पाक सरहद पर वीरातरा स्थित वीरातरा माता का मंदिर सैकड़ों वषोंर से आस्था का केन्द्र बना हुआ है। यहां प्रति वर्ष चैत्र,भादवा एवं माघ माह की शुक्ल पक्ष की तेरस एवं चौदस को मेला लगता है। अखंड दीपक की रोशनी,नगाड़ों की आवाज के बीच जब जनमानस नारियल जोत पर रखते है तो एक नई रोशनी रेगिस्तान के वीरान इलो में चमक उठती है।
वीरातरा माता की प्रतिमा प्रकट होने के पीछे कई दंतकथाएं प्रचलित है। एक दंतकथा के मुताबिक प्रतिमा को पहाड़ी स्थित मंदिर से लाकर स्थापित किया गया। अधिकांश जनमानस एवं प्राचीन इतिहास से संबंध रखने वाले लोगों का कहना है कि यह प्रतिमा एक भीषण पाषाण टूटने से प्रकट हुई थी। यह पाषाण आज भी मूल मंदिर के बाहर दो टूकड़ों में विद्यमान है। वीरातरा माता की प्रकट प्रतिमा से एक कहानी यह भी जुड़ी हुई है कि पहाड़ी स्थित वीरातरा माताजी के प्रति लोगों की अपार श्रद्घा थी। कठिन पहाड़ी चढ़ाई, दुर्गम मार्ग एवं जंगली जानवरों के भय के बावजूद श्रद्घालु दर्शन करने मंदिर जरूर जाते थे। इसी आस्था की वजह से एक 80 वर्षीय वृद्घा माताजी के दर्शन करने को पहाड़ी के ऊपर चढ़ने के लिए आई। लेकिन वृद्घावस्था के कारण ऊपर चढ़ने में असमर्थ रही। वह लाचार होकर पहाड़ी की पगडंडी पर बैठ गई। वहां उसने माताजी का स्मरण करते हुए कहा कि वह दर्शनार्थ आई थी। मगर शरीर से लाचार होने की वजह से दर्शन नहीं कर पा रही है। उसे जैसे कई अन्य भक्त भी दर्शनों को लालायित होने के बाद दर्शन नहीं कर पाते। अगर माताजी का ख्याल रखती है तो नीचे तलहटी पर आकर छोटे बच्चों एवं वृद्घों को दर्शन दें। उस वृद्घा की इच्छा के आगे माताजी पहाड़ी से नीचे आकर बस गई। वीरातरा माताजी जब पहाड़ी से नीचे की तरफ आई तो जोर का भूंप आया। साथ ही एक बड़ा पाषाण पहाड़ी से लुढ़कता हुआ मैदान में आ गिरा। पाषाण दो हिस्सों में टूटने से जगदम्बे माता की प्रतिमा प्रकट हुई। इसे बाद चबूतरा बनाकर उस पर प्रतिमा स्थापित की गई। सर्वप्रथम उस वृद्ध महिला ने माताजी को नारियल चढ़ाकर मनोकामना मांगी।
प्रतिमा स्थापना के बाद इस धार्मिक स्थान की देखभाल भीयड़ नामक भोपा करने लगा। भीयड़ अधिकांश समय भ्रमण कर माताजी के चमत्कारों की चर्चा करता। माताजी ने भीयड़ पर आए संकटों को कई बार टाला। एक रावल भाटियों ने इस इलो में घुसकर पशुओं को चुराने एवं वृक्षों को नष्ट करने का प्रयत्न किया। भाटियों की इस तरह की हरकतों को देखकर भोपों ने निवेदन किया कि आप लोग रक्षक है। ऐसा कार्य न करें, मगर भाटियों ने इसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। उल्टे भोपों को परेशान करना प्रारंभ कर दिया। लाचार एवं दुखी भोपे भीयड़ के पास आए। भीयड़ ने भी भाटियों से प्रार्थना की। इसे बदले तिरस्कार मिला। अपनी मर्यादा और इलाके के नुकसान को देखकर वह बेहद दुःखी हुआ। उसने वीरातरा माता से प्रार्थना की। माता ने अपने भक्त की प्रार्थना तत्काल सुनते हुए भाटियों को सेंत दिया कि वे ऐसा नहीं करें। मगर जिद्द में आए भाटी मानने को तैयार नहीं हुए। इस पर उनकी आंखों से ज्योति जाने लगी। शरीर में नाना प्रकार की पीड़ा होने लगी। लाचार भाटियों ने क्षमास्वरूप माताजी का स्मरण किया और अपनी करतूतों की माफी मांगी। अपने पाप का प्रायश्चित करने पर वीरातरा माताजी ने इन्हें माफ किया। भाटियों ने छह मील की सीमा में बारह स्थानों का निर्माण करवाया। आज भी रोईडे का थान,तलेटी का थान, बेर का थान, तोरणिये का थान, मठी का थान,ढ़ोक का थान, धोरी मठ वीरातरा, खिमल डेरो का थान, भीयड़ भोपे का थान, नव तोरणिये का थान एवं बांकल का थान के नाम से प्रसिद्ध है। वीरातरा माताजी की यात्रा तभी सफल मानी जाती है जब इन सभी थानों की यात्रा कर दर्शन किए जाते है।
चमत्कारों की वजह से कुल देवी मानने वाली महिलाएं न तो गूगरों वाले गहने पहनती है और न ही चुड़ला। जबकि इन इलो में आमतौर पर अन्य जाति की महिलाएं इन दोनों वस्तुओं का अनिवार्य रूप से उपयोग करती है। वीरातरा माता के दर्शनार्थ बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात समेत कई प्रांतों के श्रद्घालु यहां आते हैं।

विदेशी नमक के खिलाफ पचपदरा से छिड़ी थी जंग

महात्मा गांधी के नमक आंदोलन से पहले पचपदरा से आयातित नमक के खिलाफ जंग छिड़ी थी। जब अंग्रेजों ने इस बात पर जोर दिया कि पचपदरा के नमक की मांग नहीं है। इसे बंद कर दिया जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में पचपदरा से नमक के कुछ वैगनों को कराची बंदरगाह से लदान करवाने के बाद कलकत्ता भेजा गया। हालांकि यह बात अलग है कि अंग्रेजों की सुनियोजित स्पद्घार के कारण भारी नुकसान उठाना पड़ा था।
यह बात उस जमाने की है जब अंगे्रजों ने यह दावा किया था कि भारत बंगाल की जनता के पसंद का नमक पैदा नहीं कर सकता। इसकी आड़ में वे यहां विलायत से नमक लाने की मंशा रखते थे। क्योंकि बंगाल भारत में स्वच्छ नमक खाने वाला क्षेत्र माना जाता है। इसे अलावा आमतौर पर अंग्रेज लोग जहाजों के संतुलन के लिए उसमें पत्थर भरकर लाते थे। उनका मानना था कि उसे स्थान पर अगर नमक लाया जाए तो अतिरिक्त आय हो सकती है। उस समय सांभर नमक उत्पादन क्षेत्र में मशीनरी पर बि्रटिश सरकार ने भारी खर्चा किया। बावजूद इसे उत्पादन व्यय के मुकाबले कम प्राप्त हुआ। सांभर से भारी नुकसान उठाने के बाद उनका ध्यान पचपदरा के नमक उद्योग को बंद करने की तरफ गया। जब पचपदरा का नमक उद्योग संकट में पड़ने लगा तो सेठ गुलाबचंद ने नमक के कुछ वैगनों को कराची बंदरगाह से लदान करवाया। इसे अलावा कराची की नमक उत्पादन की फर्म नोशेखांजी कपनी से नमक खरीदकर नमक के एक जहाज का लदान कलकत्ता के लिए करवाया। जब यह नमक कलकत्ता के नमक बाजार में हड़ंप मच गया। उस जमाने में आयातित नमक की बि्रटिश नकंपियों का एक संगठन बना हुआ था। इसने दलालों के माफर्त पता करवाया कि पचपदरा का नमक किस भाव से बिकेगा? उस समय नमक के भाव 250 रुपए प्रति टन चल रहे थे। सेठ गुलाबचंद ने पचपदरा के नमक की विक्रय दर 175 रुपए प्रति टन बताई। लेकिन उन कंपनियों ने पचपदरा का नमक नहीं बिके इसके लिए दूसरे नमक की दर घटाकर 145 रुपए प्रति टन कर दी। इस दरिम्यान करीब दस माह तक भाव ऊपर चढ़ने के इंतजार के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला। ऐसे में मजबूरन भारी नुकसान में यह नमक बेचना पड़ा। इस तरह से पचपदरा नमक का यह आंदोलन सफल नहीं हो सका। परंतु पचपदरा उद्योग को चालू रखने का एक प्रयास था। इसी का नतीजा था कि टेरिक बोर्ड आन साल्ट इंडस्ट्री की स्थापना के बाद पचपदरा के खारवालों एवं मजदूरों ने हड़ताल के जरिए अंग्रेज सरकार का विरोध किया। सरकारी विरोध का नतीजा यह निकला कि सरकार ने यहां अधिक नमक की खाने खोदने की अनुमति दी।
अजब-गजब
झील नहीं,फिर भी होता है नमक उत्पादन
बाड़मेर। नमक उत्पादन स्थलों पर तकरीबन हर जगह एक झील होती है। लेकिन पचपदरा में ऐसी कोई झील नहीं है। इसे बावजूद यहां नमक का उत्पादन होता है।
पचपदरा नमक उत्पादन स्थल की एक विशेषता यह भी है कि अन्य सब स्थानों पर पानी को क्यारियों में सुखाया जाता है। परंतु पचपदरा में नमक के लिए खाने खोदी जाती है। इस समय तकरीबन 700 के करीब नमक की खाने चालू हैं। हालांकि पड़तल खानों की तादाद हजारों में है। पड़तल खान उसको कहा जाता है जिसको नमक उत्पादन बंद हो जाने के बाद दुबारा नहीं खुदवाया जाता। पचपदरा में प्रारंभिक अवस्था में पानी का घनत्व 13 से 14 डिग्री के तकरीबन रहता है। वहीं समुद्री पानी का यह घनत्व प्रारंभिक अवस्था में महज 3 डिग्री होता है। पानी का घनत्व मापने के लिए हाइड्रोमीटर का इस्तेमाल किया जाता है।

मुसलमान होने के बावजूद कुलदेवी के रूप में पूजते है हिन्दू

पाक में पीथौरा पीर,भारत में जेता की जाल

भारत-पाक सीमा से लौटकर। मजहब के नाम पर होने वाले बंटवारे के वक्त धार्मिक सद्भावना की किसे परवाह रहती है। यहीं दंश सरहदी गांवों के लोग आज भी भुगत रहे है। भारत-पाक विभाजन के वक्त पीथौरा पीर एवं जेता की जाल धार्मिक स्थल के बीच एक लकीर खींच दी गई। लेकिन मौजूदा परिदृश्य में आ रहे बदलाव से सरहदी लोगों को उम्मीद जगी है कि वे अपने रिश्तदारों से मिलने के साथ इन धार्मिक स्थानों पर आसानी से जा सेंगे।
पा में कूनरी स्थित पीथौरा पीर एवं भारत में जेता की जाल दोनों देशों के बाशिंदों के लिए आस्था का केन्द्र रहे है। विभाजन के दौरान इने अलग होने के बावजूद आस्था में किसी तरह की कमी नहीं आई। अब तक इने मुरीद दर्शनार्थ वीजा के जरिए जाते रहे है। सबसे हटकर यह बात है कि जेता मुसलमान धर्म से ताल्लुकात रखती है। लेकिन हिन्दू उसको कुलदेवी के बतौर पूजा करते है। भारत-पाक सीमा पर स्थित स्वरूपे का तला में जेता की जाल है। इसकी स्थापना 1912 में हुई थी। उस दरिम्यान टिड्डियां अक्सर फसल बर्बाद कर देती थी। ऐसे में तत्कालीन अड़बलियार निवासी शोभजी मेघवाल ने मनौती मांगी थी कि अगर टिड्डियों ने उसे खोत में खराबा नहीं किया तो वे जेता की जाल की स्थापना करेंगे। सुबह उन्होंने पाया कि टिड्डियों ने उनकी फसल को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। जबकि अन्य खेतों में काफी खराबा हुआ। रूगोणियों की डेरी में जाल की स्थापना की गई। इसे आज भी इसी नाम से पुकारा जाता है। भारत-पाक विभाजन के समय वे अड़बलियार में रह गए। रूगोणियों की डेरी भारतीय सीमा में रह गई।
कुलदेवी जेता के बारे में मान्यता है कि वह समेजी जाति की मुसलमान महिला थी। एक बार वह अपने दूध पीते बच्चे को जाल के पेड़ में झुला बांधकर पीलू चुगने गई थी। इस दौरान प्यास लगने से उसे बेटे की मौत हो गई। जेता ने भी पुत्र मोह में अपनी ईहलीला समाप्त कर दी। इसे बाद परचे देने के साथ ही जेता के नाम से मनौतियां मांगने का सिलसिला शुरू हुआ। जब लोगों की मनौती पूरी होने लगी तो उसको कुलदेवी के रूप में पूजा जाने लगा। कुलदेवी जेता की जाल पर हर साल भादवा, माघ, चेत्र की दूज को विशेष रूप से मेला भरता है। इसमें पाकिस्तान से आकर लोग शरीक होते है।
डा.एम.आर.गढ़वीर के मुताबिक जब अन्य विस्थापितों के साथ शाभजी मेघवाल का परिवार भारत पहुंचा तब तक यह खेत इस्माइल समेजा को आबंटित कर दिया गया। शुरूआत में इस्माइल ने ध्यान नहीं दिया। जब उसको नुकसान होने लगा तो बाकायदा उसने भी धार्मिक श्रद्वा जताते हुए दो बीघा जमीन जायरीनों के लिए छोड़ रखी है। जहां सालाना लोग मनौती मांगकर घी का धूप, नारियल एवं बकरे एवं घेटे की बलि चढ़ाते है। जेता को मेघवालों की कुलदेवी के बतौर माना जाता है। पाकिस्तान में इब्राहिम का तला, चारणोर, कितारी, मिठड़िया, तिगुसर, चेलार, कांकईया,संग्रासी का तला, कठा, नगरपारकर एवं खावड़ समेत कई गांवों में कुलदेवी जेता के मुरीद रहते है। उने मुरीदों का कहना है कि अगर बस शुरू होती है तो फिर सद्भावना की मिसाल को बल मिलेगा। उमरकोट निवासी किशनराम ख्याला दो मर्तबा यहां आ चुके है। इसी तरह पाक में अमरकोट से आगे कूनरी के पास पीर पीथौरा की मजार है। जहां पर मुख्य पुजारी परपंरागत मेघवाल समाज से होता है। सरहदी गौहड़ का तला, भुरावा, स्वरूपे का तला, आंगनशाह की ढाणी, गुमाने का तला, मिठड़ाऊ, बीजासर एवं बुहरान का तला के लोग पीर पीथौरा के मुरीद है। उनकी मजार पर जाने का सिलसिला विभाजन से पहले एवं बाद भी जारी है।

Thursday, May 13, 2010

बारमेर today

રણમાંથી ઘૂસણખોરી રોકવા માટે તારની વાડની ઊંચાઈ વધારાશે
Madan Barupal, BadmerThursday,
સરહદ પરથી થતી ઘૂસણખોરી રોકવા માટે પિશ્ચમી સરહદ પર ફિટ કરવામાં આવેલી તારની વાડની ઊંચાઇ વધારવામાં આવશે. આ માટે બીએસએફએ એક વ્યાપક યોજના બનાવી છે. જોરદાર પવન ફૂંકાવાના કારણે ઘણી વખત તારની વાડ રેતીમાં દબાઇ જાય છે અથવા તો તેના નીચેની રેતી ખસી જાય છે. આવી તમામ જગ્યાઓ શોધી કાઢીને તારની વાડની ઊંચાઇ વધારવામાં આવશે.

જિલ્લાના મુનાબાવ, રોહિડી અને તેની નજીકના વિસ્તારોમાં કેટલીય જગ્યાઓએ તારની વાડ નીચેની રેતી પવનમાં ઉડી ગઇ છે. આંધીના કારણે આ વિસ્તારોમાં રેતીના ટેકરા પોતાની જગ્યા બદલતા રહે છે. ખાસ કરીને રોહિડીની નજીકના વિસ્તારોમાં તો દરરોજ રેતીના ટેકરાની જગ્યા બદલાઇ જાય છે. અહીં ઝાડ ન હોવાના કારણે રેતી ઘણી ઝડપથી ઉડતી રહે છે. આ કારણે ઘણી વખત રસ્તો બંધ થઇ જવાના કારણે પણ બીએસએફને મુશ્કેલીઓનો સામનો કરવો પડે છે.

પાકિસ્તાન સાથે જોડાયેલી ૨૩૩ કિમી લાંબી સરહદની સુરક્ષાની જવાબદારી બાડમેર સેકટરના બીએસએફની છે. જવાનોને થર્મલ ઇમેજર જેવા અત્યાધુનિક સાધનો આપવામાં આવ્યાં છે. આમ છતાં પણ ભીષણ ગરમી અને વંટોળના સમયે ચોકી કરવાનું મુશ્કેલ થઇ જાય છે. રેતીના વંટોળમાં થોડા દૂર સુધીનું પણ દેખાતું નથી. આવા સમયે ઘૂસણખોરી તથા અન્ય સંદિગ્ધ ગતિવિધિઓની આશંકાના કારણે બીએસએફના જવાનોએ ખાસ સતર્ક રહેવું પડે છે.

યુદ્ધના ધોરણે કામકાજ ચાલુ :

ગુજરાત ફ્રંટિયર વિસ્તારમાં ૩૪૦ કિમીના વિસ્તારમાં તારની વાડ લગાડવાની છે. આ કામ એનબીસીસી અને કેન્દ્રીય લોક નિર્માણ વિભાગ કરાવી રહ્યું છે. અત્યાર સુધીમાં ૧૭૯ કિમી વિસ્તારમાં તારની વાડ લગાવી દેવાઇ છે.

બીએસએફ ગુજરાત ફ્રંટિયરના આઈજી ગોપાલ સિંહ શેખાવતે જણાવ્યું કે, આ કામને ટૂંક સમયમાં જ આગળ વધારાશે.

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बारमेर today

मोरपंख की खरीद-फरोख्‍त पर लगेगी रोक



मोरपंखों और इससे बनी सजावटी वस्तुओं या अन्य सामानों की खरीद-फरोख्त पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी है। वन्यजीव सुरक्षा कानून-1972 में घरेलू बाजार में मोर पंख के व्यापार की छूट दी हुई है, जिसे केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय का वापस लेने का प्रस्ताव है। अधिकारियों का मानना है कि मोर पंखों की मांग और बिक्री में तेजी आई है, जिससे पंखों के लिए इनके शिकार की घटनाएं भी बढ़ी हैं।

वन्यजीव सुरक्षा कानून के तहत मोर के शिकार, पालन और इसके पंखों के निर्यात पर प्रतिबंध हैं। अब इस कानून में संशोधन कर घरेलू बाजार में मोरपंख या इससे संबंधित वस्तुओं की बिक्री पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है।

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Google seग्रामीणों के लिए वरदान बनी मनरेगा की बेरियां


बाड़मेर: देश की पश्चिमी सरहद पर बसे सांता के ग्रामीणों के लिए बारिश के मौसम को छोड़कर सालाना रोजगार की तलाश में पलायन करना एक नियति बन गया था, लेकिन महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) ने गांव के साथ ग्रामीणों की तस्वीर भी बदल दी है। हरियाली की बिसात के साथ ग्रामीणों को स्थानीय स्तर रोजगार उपलब्ध हो गया है।
राजस्‍थान के बाड़मेर जिले की चौहटन पंचायत समिति के सांता ग्राम पंचायत निवासी कृष्णदान, बस्ताराम कोली समेत कई ग्रामीणों ने कभी सोचा नहीं था कि उनका खुद का कोई काम-धंधा होगा, जिसके मालिक वे स्वयं होंगे। वे सालाना अन्य ग्रामीणों के साथ रोजगार की तलाश में गुजरात जाते थे। अपने परिवार को पेट पालने के लिए साल में उनको 7-8 माह गुजरात में बिताने पड़ते थे। पिछले साल मनरेगा में हुई बेरियों की स्वीकृति ने इनके साथ गांव की तस्वीर बदल दी। कृष्णदान, बस्ताराम कोली समेत 72 ग्रामीणों की मनरेगा योजना में बेरियां स्वीकृत हुई। इनमें से अधिकतर लोगों ने इस समय जीरे, इसबगोल एवं सरसो की बुवाई कर रखी है। आज इनके चेहरे खुशी से खिले हुए हैं।
बस्ताराम कोली के मुताबिक, उन्‍होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि वह अपने बलबूते रबी की फसल की बुवाई करेगा। मनरेगा में बेरी खुदने के साथ उसने विद्युत कनेक्‍शन भी लिया है। बस्ताराम की पत्नी अणदूदेवी खुशी का इजहार करते हुए बताती है कि मनरेगा ने उनकी जिन्दगी बदल दी है। उनके अनुसार, वह पहले गांव में चंद लोगों को बेरी से सिंचाई करते हुए देखती थी, लेकिन आज उसके खेत में बेरी खुदने के साथ रबी की फसल लगी हुई है, जिसकी मालिक वह खुद है। कृष्णदान समेत कई अन्य ग्रामीणों ने अपने खेतों में बेरियां खुदने के बाद डीजल सेट लगाए है। अब उनका रोजगार की तलाश में गुजरात एवं अन्य इलाकों का सफर खत्म हो गया है।
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Monday, May 10, 2010

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Ùð˜æãUèÙæ¢ð ·ð¤ ¥¢çÏØæÚðU ÁèßÙ ×¢ð Á»è ©UÁæÜð ·¤è ©U×èÎ

ÕæÇ¸U×ðÚUÐ Ùð˜æãUèÙæ¢ð ·ð¤ ÂéÙüßæâ ·ð¤ âæÍ ©UÙ·¤æð çàæçÿæÌ ·¤ÚUÙð ·¤æ ÕèǸUæ ·é¤ÀU Sߨ¢âðßè â¢SÍæ¥æ¢ð Ùð ©UÆUæØæ ãñUÐ §âè ·¤æ ÙÌèÁæ ãñU ç·¤ ·é¤ÀU Ùð˜æãUèÙ âŽÁè Õð¿·¤ÚU ¥ÂÙæ »éÁæÚUæ ¿Üæ ÚUãðU ãñUÐ Ùð˜æãUèÙ ÕæÜ·¤æ¢ð ·¤æð çàæÿæ·¤ ©Ù·ð¤ ƒæÚU Áæ·¤ÚU çàæçÿæÌ ·¤ÚUÙð ×¢ð ÁéÅðU ãñUÐ §â âר âÚU·¤æÚUè ØæðÁÙæ¥æ¢ð ·¤æ ·¤æð§ü ¹æâ ȤæØÎæ ÎëçCïUÕæçÏÌæ¢ð ·¤æð ÙãUè´ ç×Ü ÚUãUæ ãñUÐ ÂÚ¢UÌé §Ù â¢SÍæ¥æ¢ð ·¤è ÂãUÜ Ùð ¥¢ÏðÚðU ÁèßÙ ×¢ð ©UÁæÜð ·¤è ©U×èÎ Á»æ Îè ãñUÐ
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×éËÌæÙè ç×^ïUè ×¢ð çÀUÂð ã¢ñU ÂéÚUæÌÙ ·¤æÜ ·ð¤ ÚUæÁ

ÕæÇ¸U×ðÚ. ·¤ÂêÚUǸUè °ß¢ ¥æâÂæâ ·ð¤ §Üæ·¤æ¢ð ×¢ð ç×ÜÙð ßæÜè ×éËÌæÙè ç×^ïUè ÂéÚUæÌÙ ·¤æÜ ·ð¤ ·¤§ü ÚUæÁ â×ðÅðU ãéU° ãñUÐ ØãUæ¢ ×éËÌæÙè ç×^ïUè ×¢ð ÎÕð ßæÙSÂçÌ·¤ ¥ßàæðá âר-âר ÂÚU ç×ÜÌð ÚUãUÌð ãñUÐ çßàæðá·¤ÚU ÙæçÚUØÜ ·ð¤ ÂæñÏæ¢ð ·ð¤ ¥ßàæðáæ¢ð âð ØãU ÕæÌ ÂéÌæ ãUæð ¿é·¤è ãñU ç·¤ ÕæÇ¸U×ðÚU ·ð¤ ·é¤ÀU Öæ»æ¢ð ·¤è ÁÜßæØé Üæ¹æ¢ð ßcæü ÂãUÜð â×é¼ýè ÌÅUèØ ÁÜßæØé ·ð â×æÙ ÚUãUè ãñUÐ
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