बाड़मेर। भले ही 1982 में एशियाड धोधे खां के अलगोजे की धुन पर शुरू हुआ हो या खड़ताल के जरिए विदेशों में धूम मची हो। लेकिन नए कलाकार परंपरागत वाद्य यंत्रों को बजाना सीखना नहीं चाहते। इसके चलते अब अलगोजा,नड़ तथा कमायचा बजाने वाले कम शख्य ही इस वक्त जिन्दा है। इससे भी बुरी खबर यह है कि इन वाद्य यंत्रों को बनाने वाले भी कम हो गए है। ऐसे में यह कहा जाए कि आगामी वर्षों में इन वाद्ययंत्रों को बनाने वालों के साथ बजाने वालों की कमी खलेगी तो शायद कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
पश्चिमी राजस्थान के संगीत के साथ बाड़मेर एवं जैसलमेर के कलाकारों की अपनी अनूठी कहानियां रही है। पहले की बात हो या मौजूदा समय की। ये कलाकार जीवन के हर पल में शरीक होते रहे है। लेकिन समय के साथ पुराने वाद्ययंत्रों को बजाने वालों की तादाद घटती जा रही है। अलगोजा वाद के रूप में धोधे खां,कमरूद्दीन,हबीब खां के साथ कुछ अन्य लोग, नड़वादक आमद एवं शेरू तथा मोरचंग बजाने वालों में बाछड़ाऊ का मालाराम एवं जैसलमेर का अलादीन चर्चित है। जब तक ये कुछ कलाकार जिन्दा है तब तक इन वाद्ययंत्रों को बजाने की कला भी जीवित रह सेगी। जवानी में एक घंटे तक अलगोजा बजाने वाले धोधे खां की अब कुछ मिनट के बाद सांस फूल जाती है। उसे आज भी याद है जब उसकी धुन पर एशियाड शुरू हुआ था। इसे अलावा 24 नवंबर 1986 को वो दिन जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और सोनिया गांधी दौरे पर आए थे। तब उन्होंने उससे दोपहर भोज के दौरान अलगोजा सुना था। बिजड़ियार निवासी कमरूद्दीन भी अलगोजा बजाने में पारंगत है। ये दोनों पाक से अपने उस्ताद मिसी जमाली से अलगोजा सीखकर आए थे। अब इस कला को सीखने वाले नए कलाकारों की बात तो दूर रही धोधे खां खुद ही भूखमरी का सामना कर रहे है।
जानकारों के मुताबिक वाद्ययंत्रों को बजाने वालों के साथ इनको बनाने वाले भी घटे है। इतना ही नहीं मध्य एशिया में धनचक के नाम से जाना जाने वाला कमायचा रोहिड़े एवं आक की लकड़ी से बनाया जाता है। इसमें बकरे की खाल के साथ इसकी गजक मान में घोड़े के बाल लगाए जाते है। कमायचा बजाने वाले करीब डेढ़ दर्जन लोग ही रह पाए हैं। राणका फकीरों द्वारा बजाया जाने वाला अलगोजा केर एवं बांस की लकड़ी से बनता है। वहीं नड़ बनाने के लिए केर एवं कगोर की लकड़ी इस्तेमाल की जाती है। जबकि मोरचंग पीतल या लोहे का बनाया जाता है। इसे सामान्तया गायों को चराने वाले चरवाहे बजाते आए है। बहरहाल इसे बजाने वाले भी दिनोंदिन घट रहे है। बुजुर्ग कलाकारों के शब्दों में कई वाद्ययंत्र तो खत्म हो चुके है ऐसे में इनको बचाए रखने की जरूरत है। कई मर्तबा उनकी कोशिश होती है कि नई पीढ़ी इस कला को सीखे। लेकिन कोई खड़ताल के साथ इसे सीखना नहीं चाहता ऐसे में अगर कोई पहल करें तो शायद कुछ काम बन सकता है। उनको तो ये पता है कि उने साथ ही यह कला खत्म होने के साथ उने वाद्ययंत्र भी कुछ समय बाद कबाड़ का हिस्सा बन जाएंगे।
No comments:
Post a Comment