Thursday, May 13, 2010

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Google seग्रामीणों के लिए वरदान बनी मनरेगा की बेरियां


बाड़मेर: देश की पश्चिमी सरहद पर बसे सांता के ग्रामीणों के लिए बारिश के मौसम को छोड़कर सालाना रोजगार की तलाश में पलायन करना एक नियति बन गया था, लेकिन महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) ने गांव के साथ ग्रामीणों की तस्वीर भी बदल दी है। हरियाली की बिसात के साथ ग्रामीणों को स्थानीय स्तर रोजगार उपलब्ध हो गया है।
राजस्‍थान के बाड़मेर जिले की चौहटन पंचायत समिति के सांता ग्राम पंचायत निवासी कृष्णदान, बस्ताराम कोली समेत कई ग्रामीणों ने कभी सोचा नहीं था कि उनका खुद का कोई काम-धंधा होगा, जिसके मालिक वे स्वयं होंगे। वे सालाना अन्य ग्रामीणों के साथ रोजगार की तलाश में गुजरात जाते थे। अपने परिवार को पेट पालने के लिए साल में उनको 7-8 माह गुजरात में बिताने पड़ते थे। पिछले साल मनरेगा में हुई बेरियों की स्वीकृति ने इनके साथ गांव की तस्वीर बदल दी। कृष्णदान, बस्ताराम कोली समेत 72 ग्रामीणों की मनरेगा योजना में बेरियां स्वीकृत हुई। इनमें से अधिकतर लोगों ने इस समय जीरे, इसबगोल एवं सरसो की बुवाई कर रखी है। आज इनके चेहरे खुशी से खिले हुए हैं।
बस्ताराम कोली के मुताबिक, उन्‍होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि वह अपने बलबूते रबी की फसल की बुवाई करेगा। मनरेगा में बेरी खुदने के साथ उसने विद्युत कनेक्‍शन भी लिया है। बस्ताराम की पत्नी अणदूदेवी खुशी का इजहार करते हुए बताती है कि मनरेगा ने उनकी जिन्दगी बदल दी है। उनके अनुसार, वह पहले गांव में चंद लोगों को बेरी से सिंचाई करते हुए देखती थी, लेकिन आज उसके खेत में बेरी खुदने के साथ रबी की फसल लगी हुई है, जिसकी मालिक वह खुद है। कृष्णदान समेत कई अन्य ग्रामीणों ने अपने खेतों में बेरियां खुदने के बाद डीजल सेट लगाए है। अब उनका रोजगार की तलाश में गुजरात एवं अन्य इलाकों का सफर खत्म हो गया है।
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